मंगलवार, 13 सितंबर 2016

बाढ़ के बरस - कविता 1 एवं 2


बाढ़ के बरस - 1

प्रवीण भारद्वाज

रचनावर्ष – 2006

रचनास्थल – गुवाहाटी, असम

 

बाढ़ के बरस

हर बार मेरे अंदर

के चट्टान से कुछ

दरक-सा जाता है।

 

मेरे मन के मजबूत बाँध

व किनारों को तोड़

दो इंच जमीन

सरका चला जाता है।

 

बहा ले जाता है

मेरी स्मृतियाँ – मेरे धरोहर

मेन मन मंदिर को

पाँक-पानी में धंसा जाता है।

 

धुआँ कर जाता है

मेरे इरादों को, जो फौलादी होती हैं,

मेरे प्रेम के अंकुर को

फफूँद बनाकर जाता है।

 

मेरी दुआ से इकट्ठा हुईं

मेरे विश्वास,

श्रद्धा एवं सद्वृत्तियों को

कपूर की भांति उड़ा ले जाता है।

 

 

बाढ़ के बरस – 2

 

बाढ़ के बरस

न केवल दरकते हैं बाँध, मेड़, खेत व सड़कें

बल्कि सदैव चौड़ी रहने वाली

छाती भी थोड़ी और दरक जाती है।

 

बाढ़ के बरस

फीका रहता है दीपावली एवं दशहरा

और फीकी रहती है चेहरों पर सदैव

पसरी रहने वाली मुस्कान भी।

 

बाढ़ के बरस

नवान्न दूसरे से धान

माँगकर मनानी पड़ती है

धान की रोपनी एवं कटनी

समय पर नहीं हो पाती।

 

बाढ़ के बरस टल जाती है

बहनो-बेटियों की शादी-दुरागमन

टल जाता है बेटियों-बहनों का सामा-चकेबा में

माँ-बाप, भाई-भौजाइयों के पास उनके गाँव

जाना सामचक-सामचक गीत गाने के लिए।

 

बाढ़ के बरस

नहीं सिल पाता है नया कपड़ा

दशहरा या दीपावली पर

छठ के डाले पर सूर्यदेव के लिए

कम पड़ता है केले का घौद।

 

पर्व-त्योहारों पर बड़े

जोरों के साथ उँचे सुरों में

गाए जाने वाले गीतों

के बोल मद्धिम पड़ जाते हैं

बाढ़ के बरस में।

 

कम ही हो पाती है

ताल-मखाना की खेती बाढ़ के बरस में

और इसे उपजाने वाले मल्लाहों के

चेहरे की बेचारगी और मायूसी

थोड़ी और पसर जाती है।

 

ये सब हो जाता है

आम लोगों के जीवन में

जिंदगी घिसटती नजर आती है,

सवेरा खुशनुमा नहीं होता

और शाम वीरानी होती है।

 

लेकिन फिर भी

साहिबान-हुक्मरान-नेता-बबुआन के

जीभ से लार टपकती है कि ये

बाढ़-ऐसी ही भयंकर विनाशकारी बाढ़

अगले बरस फिर आए, हे भगवान! कृपा करना।  

 

साहित्य अकादमी की द्वैमासिक पत्रिका

समकालीन भारतीय साहित्य के अंक - 129

जनवरी-फरवरी, 2007 में प्रकाशित

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

सोमवार, 16 फ़रवरी 2015

बागमती नदी की कहानी

बागमती नदी नेपाल से निकलकर काठमांडू शहर के किनारे किनारे बहती है । काठमंडू में पशुपतिनाथ महादेव का मंदिर बागमती नदी के किनारे स्थित है। वहां से आगे बहती हुई बागमती मिथिला होते हुए बिहार में गंगा नदी से मिल जाती है।

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

कोशी त्रासदी - नदी खोलो बांध तोड़ो

दुई पाटन के बीच में - एक dacumentary फिल्म है, इसके फ़िल्मकार हैं श्री अरविन्द सिन्हा । श्री अरविन्द सिन्हा को आठ राष्ट्रपति पुरस्कार और ७ अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त है। बड़ी नदी को और वो भी कोशी जैसी ध्वंसकारी नदी को बांधने से क्या हो सकता है, उसी बात को इस वृत्तचित्र में तफसील से बताने की कोशिश की गयी है। विज्ञान को ही सर्वस्व मानाने वाले सभ्य समाज के सामने यह फिल्म बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगता है। दस बरस
पूर्व बने इस फिल्म में इन सवालों को बहुत ही मार्मिक ढंग से उठाया गया है जिनके ऊपर आज कल के हुक्मरान, नौकरशाह और टेक्नोक्रेट नहीं समझाते हैं। जिस कोशी-कमला को बांधकर मिथिला को फायदा पहुँचाने की बात कही गयी थी, आज उन्ही बांधों से मिथिला तबाह-ओ-बर्बाद हो रहा है, तो इन सवालों के जवाब देने वाले कहाँ हैं, कोई इस बारे में कुछ बताता क्यों नहीं। कोशी-कमला को बांधने से पहले बाढ़ से हर साल मात्र २३ लाख लोग प्रभावित होते थे, आज उसी कोशी कमला को बाँधने के बाद हर साल बाढ़ से ६५ लाख से ज्यादा लोग प्रभावित होते हैं। बिहार सरकार से लेकर भारत सरकार तक सभी कोशी को बेचकर बिहार और मिथिला की जनता को ठगा हैं। मिथिला और बिहार की जनता अब और बाँध के खेल को चलने नहीं देगी। कोशी और कमला के साथ बहने वाले गाद मिटटी के कारण आज बांध के बीच बहने वाली नदी ऊपर हो गयी हैं और बांध के बहार रहने वाले लोग ही निचे हो गए हें, ये कैसा बांध का विज्ञान हैं।
पहले कोशी कमला इलाके के लोग मालिक होते थे भारत और बिहार सरकार की एक निति से सभी १९६४ के बाद से नौकर और मजदूर बनकर रह गए। कोशी नहर का खेल भी अभी तक चल ही रहा हैं। लाखों हेक्टेएर
सोना उगलने वाली जमीन को औने पौने दाम में लेकर सरकार ने आज तक एक बूँद पानी कोशी नहर में नहीं छोड़ा और पूरे बिहार के engiineeron ने हजारों karoron रुपये डकार लिए। सवाल उनके पैसे डकारने के नहीं हें सवाल केवल एक हैं और वह हैं मिथिला की जनता के नदियों के साथ सदियों सदियों के रिश्ते का हैं और सवाल हैं इन नदियों को उनके बांधों से मुक्ति का। मिथिला के लोग जो हजारों सालों से नदियों के साथ रहते आए हें, उन्हें किसी बाहरी विज्ञान की जरूरत नहीं हैं और न ही किसी सरकार के बनाये गए किसी बाँध की कोई जरूरत नहीं हैं। मिथिला के पानी के साथ पानी के बीछ में रह कर रोटी- दाल -मांछ -साग-आलू सन्ना खाकर जी लेंगे और इतने आत्मनिर्भर इन्ही नदियों की पानी से हो लेंगे क़ि उन्हें किसी बिहार सरकार या किसी भारत सरकार के सामने हाथ फ़ैलाने की जरूरत नहीं होगी।
आशा हैं हमारी बात मिथिला-बिहार-भारत का कोई सपूत पूरी शिद्दत के साथ समझेगा और मेरे नदी खोलो-बांध तोड़ो अभियान का सहभागी बनेगा। आमीन ।

इन वर्षों में और क्या क्या हुआ यह ब्लॉग में आगे पढ़ें।